History Of Jadauns

यदुकुल शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण जी के जन्म एवं नामकरण -संस्कार के विषय में जाने–

– वसुदेवस्य तनयो यदोवंशसमुद्दव : । मुचुकुंदोअपि तत्रासौ वृद्ध गागर्य वचोत्स्मरत।। पुरा गार्ग्यऐंन कथितमष्टा विंशतिमे युगे । द्वापरान्ते हरेजन्म यदुवंशे भविष्यति ।। मैं चन्द्रवंश के अंतर्गत यदुकुल में वसुदेव जी के पुत्ररूप में उत्तपन्न हुआ हूँ ।मुचुकुंद जी ने कहा कि पूर्व काल में गार्ग्य मुनि ने कहा था कि अट्ठाईसवें युग में द्वापर के […]

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मध्यकाल में यदुवंशी जादों क्षत्रियों के राज्य—

मध्यकाल में यदुवंशी जादों क्षत्रियों के राज्य– 1-महावन का यदुवंशी राज्य– हिमालय की तराई के जंगलों से होती हुई महमूद गजनवी की तुर्क सेनाओं ने यमुना नदी को भी पार कर लिया।अब वे दक्षिण की ओर अग्रसर हुई , और मथुरा के क्षेत्र में स्थित महावन नगर को उन्होंने संवत 1074 ई0सन 1018 में आक्रान्त

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मथुरा के यदुवंशी जादों (पौराणिक यादव ) क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन–

मथुरा के यदुवंशी जादों (पौराणिक यादव) क्षत्रिय राजवंश का ऐतिहासिक अध्ययन— क्षत्रिय वर्ण से सम्बन्ध ब्रज प्रदेश में प्राचीन काल से निवास करने वाली जातियों में यादवों  (आधुनिक जादों ,भाटी , जडेजा ,बनाफर , जाधव , चुडासमा , वाडियार ) का नाम उल्लेखनीय है । यादवों के मूल पुरुष यदु थे , जिनके नाम पर

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महाराजा सर भंवरपाल देव बहादुर यदुकुल चन्द्रभाल का शासन को करौली के सतयुग की संज्ञा—

महाराजाधिराज  सर भंवरपाल देव बहादुर ,यदुकुल -चन्द्र भाल  का शासनकाल करौली के सतयुग की संज्ञा— — महाराजा अर्जुनपाल के 1886 में देहान्त होने के बाद भंवर पाल जी  करौली के राजा बने ।महाराजा अर्जुन पाल जी के समय भंवरपाल जी हाडौती के राव थे और इनके नजदीकी भतीजे थे। |इनका जन्म 24 फरवरी 1864 को

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करौली के महानतम शासक गोपाल सिंह द्वितीय एवं करौली विकास —

करौली के महानतम  शासक गोपाल सिंह द्वितीय एवं करौली का विकास — करौली के इतिहास में महाराजा गोपालदास जी के 135 वर्ष  बाद सन 1724 में  सर्वाधिक प्रभावशाली एवं इकबाल बुलन्द शासक महाराजा गोपालसिंह जी द्वितीय रहे थे। ये महाराजा कुंवरपाल जी के ज्येष्ठ पुत्र थे।अपने पिता के देहांत के बाद सन 1724 ई0 विक्रम

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करौली के महानतम शासक एवं संस्थापक महाराजा अर्जुनदेव तथा उनकी संतति —

करौली महानतम शासक एवं संस्थापक महाराजा अर्जुनदेव तथा उनकी संतति — तिमनगढ़ पतन के बाद वहां के यदुवंशी शासक कुँवरपाल का कोई भी उत्तराधिकारी उस समय यह दुर्ग एवं अपना खोया हुआ पैतृक राज्य पुनः प्राप्त नहीं कर सका।इस कारण सन 1196 ई0 से 1327ई0 तक का इस वंश का तिथिक्रम संदिग्ध है तथा उपलब्ध

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दास्ताने पारस पत्थर ,नटनी की छतरी एवं वीराने खण्डहर दुर्ग तिमनगढ़–

दास्ताने पारस पत्थर , नटनी की छतरी एवं वीराने खण्डहर दुर्ग तिमनगढ़– बयाना के यदुवंशी  महाराजा विजयपाल की मृत्यु के बाद यादव राजवंश छिन्न -भिन्न हो गया ।इनके पुत्र छोटे -छोटे दल बना कर इधर -उधर डोलने लगे , परन्तु कहीं पर उपर्युक्त स्थान नहीं मिला ।कुछ को अपना राज्य जमाने का अवसर मिल गया

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मध्यकालीन त्रिभुवनगिरि दुर्ग का गौरवशाली स्वर्णिम युग:सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर का प्रतीक —

मध्यकालीन  त्रिभुवनगिरि दुर्ग का गौरवशाली स्वर्णिम युग : सांस्कृतिक एवं कलात्मक धरोहर का प्रतीक — त्रिभुवनगिरि दुर्ग –इस मध्यकालीन दुर्ग का निर्माता महाराजाधिराज त्रिभुवनपाल या तिहुणपाल के नाम पर ही “त्रिभुवनगिरि “रखा गया है ।इस दुर्ग को ताहनगढ़ , तिमनगढ़ ,थनगढ़ , थनगिरि आदि नामों से भी जाना जाता है ।जैसवाल जैन जैसलमेर का त्याग

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मध्यकालीन तिमनगढ़ दुर्ग के गौरवशाली स्वर्णिमयुग का ऐतिहासिक अध्ययन —

मध्यकालीन तिमनगढ़ दुर्ग के गौरवशाली स्वर्णिम युग  का ऐतिहासिक अध्ययन—- यहां के यादव /यदुवंशी  क्षत्रिय राजा शूरसेन जनपद (प्राचीन मथुरा राज्य ) के उन चन्द्रवँशी यादवों के वंशज थे जिनके नेता श्री कृष्ण थे । सन 1146 ई0 के लगभग त्रिभुवनगढ़ में श्री जिनचंद्र सूरि पधारे थे ।त्रिभुवनगिरि के यादव राजा कुँवरपाल ने जैनमुनि जिनदत्त

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करौली राज्य के प्राचीन उंटगिरि दुर्ग का ऐतिहासिक अवलोकन —

करौली राज्य के प्राचीन दुर्ग उंटगिरि का  ऐतिहासिक अवलोकन — करौली क्षेत्र में उतगिरि के किले को मध्यकालीन राजपूताने के विशाल दुर्गों में माना जाता है ।यह दुर्ग घने जंगल के भीतरी भाग में स्थित है ।दुर्ग के आस -पास कोई भी  वस्ती की बसावट नहीं है।जंगली क्षेत्र को पार करके दुर्ग तक पहुंचना बड़ा

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